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जलवायु परिवर्तन

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हाल ही में आईपीसीसी ( IPCC ) द्वारा जलवायु परिवर्तन पर जारी रिपोर्ट ने विश्व समुदाय को इसके प्रति सचेत किया है । IPCC ने ‘ ग्लोबल वार्मिंग ऑफ 1 . 5°C ‘ नामक शीर्षक से एक विशेष रिपोर्ट जारी की है । जिसमें वैश्विक तापन की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश । डाला गया है तथा यह बताया गया है कि मानव जनित ग्लोबल वार्मिंग 2017 में ही पूर्व – औद्योगिक स्तर से 1°C के ऊपर पहुंच चुका है ।

इस रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया है कि 2030 – 2052 के बीच इसके 1 . 5°C से ऊपर पहंचने की संभावना है । वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग की इस समस्या को देखते हुए जलवायु परिवर्तन के प्रति समझ और जागरुकता को बढ़ाने की आवश्यकता है ।

जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन का सामान्य अर्थ जलवायवीय दशाओं में आने वाले व्यापक परिवर्तन से है , जो वस्तुतः तापमान , वर्षा आदि के पैटर्न में बदलाव को इंगित करता है ।

– यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है ,जो प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों के प्रभाव से घटित होती है ।

प्राकृतिक कारक

(a) सौर कलंकों की मात्रा में वृद्धि ,                (b) सौर विकिरण में विभिन्नता ,

(c) पृथ्वी का अक्षीय झकाव तथा कक्षा परिवर्तन ,

(d) ज्वालामुखी उद्गार ,के                                 (e) महाद्वीपीय विस्थापन ।

जलवायु परिवर्तन वास्तव में एक प्राकृतिक प्रक्रिया है , जो प्रकृति में घटित होती है , परन्तु वर्तमान में मानवीय गतिविधियों ने इस प्रक्रिया को तीव्र कर दिया गया है ।

निम्नलिखित मानवीय गतिविधियों ने इसे प्रभावित किया है :

(a) तीव्र औद्योगीकरण ,                     (b) वनोन्मूलन तथा तीव्र शहरीकरण ,

(c) जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग ,          (d) ग्रीन हाउस गैसों का तीव्र गति से उत्सर्जन ,

(e) भूमि – उपयोग में बदलाव ।

जलवायु परिवर्तन वर्तमान में कई वैश्विक मुद्दों जैसे – गरीबी , आर्थिक विकास , प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ – साथ समुद्री पारितंत्र एवं मानव तथा जीव – जंतुओं के लिए चिंता का विषय है ।

रिपोर्ट के मुख्य तथ्य इस रिपोर्ट में 1 . 5°C तापमान वृद्धि होने से कई प्रभावों जैसे समुद्री स्तर में वृद्धि ,वर्षा की मात्रा में वृद्धि , सुखा एवं बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि , हीट वेव एवं चक्रवातों की तीव्रता में वृद्धि के साथ – साथ महासागरीय अम्लीयता और लवणता में वृद्धि की | प्रबल संभावना व्यक्त की गई है । अगर तापमान में 1 . 5°C से 2°C के बीच वृद्धि होती है तो वह | फसल उत्पादन में कमी को बढ़ाकर 2050 तक गरीबों की संख्या में तीव्र वृद्धि करेगी । प्रवाल भित्तियों में 70 . 90 % के बीच हास होने के साथ – साथ अगर 2°C तक तापमान वृद्धि होती है ,तब लगभग प्रवाल भित्तियों की समाप्ति का अनुमान है । रिपोर्ट में यह बताया गया है कि यदि तापमान को 1 . 5°C पर सीमित करना है तो 2030 तक CO ,उत्सर्जन को 2010 के स्तर से 45 % कम कर 2050 तक निवल शून्य उत्सर्जन ( net Zero emissions ) के स्तर पर लाना होगा । उपर्युक्त रिपोर्ट के आलोक में यह आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन की संकल्पना उसके प्रभाव , चुनौतियां एवं शमन के उपायों को समझा जाए : ताकि विश्व समुदाय इस वैश्विक संकट से निपटने में सक्षम हो सके ।

हरित गृह (ग्रीन हाउस गैस)

गैस वायुमंडल में मौजूद वे गैसें जो सूर्य से आने वाली लघुतरंगों को पृथ्वी के वायुमंडल में रोककर उसे गर्म करने में भूमिका निभाती हैं , हरित गृह गैसें कहलाती हैं ।

1 प्रमुख हरित गृह गैसों में सम्मिलित है

1 .कार्बन डाइऑक्साइड ( CO2 , )                        2 . मिथेन (CH4) ,

3 .नाइट्रस ऑक्साइड (N 2 O) ,

4 .फ्लूरोनिटेड गैस – (क्लोरोफ्लोरो कार्बन , हाइड्रोफ्लोरो कार्बन , परफ्लोरोकार्बन , सल्फर हेक्साक्लोराइड व नाइट्रोजन हाइफ्लोराइड ) ,

5 .हेलोन्स ,                           6 . जलवाष्प ।

पृथ्वी के वायुमंडल में पाई जाने वाली कुछ गैसें सौर विकिरण को धरातल तल पहुंचने में बाधा उत्पन्न नहीं करती हैं । परन्तु वे पृथ्वी से विकरित होने वाली दीर्घ तरंगों को रोककर पुनः भू – सतह पर परावर्तित कर देती हैं । वायुमंडल में घटित होने वाली यह घटना – हरित गृह प्रभाव के नाम से जानी जाती है ।

कार्बन उत्सर्जन

2018 में ऊर्जा की बढ़ती मांग के कारण 1 . 7 % की वृद्धि दर्ज की गई ,जिसमें ऊर्जा क्षेत्र का योगदान दो – तिहाई है । चीन , भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस नेट उत्सर्जन में 85 % का योगदान दिया ; जबकि जर्मनी , जापान , मैक्सिको , फ्रांस तथा ब्रिटेन में CO , उत्सर्जन में गिरावट दर्ज की गई ।

 

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